कालबेलिया शादी मेें बेटी को गुदड़ी देने की परंपरा

 27 Aug 2021 12:45 AM

जनजातीय संग्रहालय में जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी की ओर से 10 दिवसीय निस्पन्द कला शिविर आयोजित किया गया है । इस शिविर में कालबेलिया समुदाय के कलाकार और बुनकरों ने हिस्सा लिया है। जिसमें कोई अपनी गुदड़ी परंपरा को दिखा रहा है तो कोई पारंपरिक सुरमा (काजल) बनाने की विधि को बता रहा है। शिविर में करीब 50 कलाकारों ने हिस्सा लिया है। इनमें मध्यप्रदेश और राजस्थान के रहने वाले कलाकार हैं, जो गुदड़ी सृजन के साथ ही कढ़ाई-बुनाई, पारंपरिक वेशभूषा, मोती की माला एवं कांच कार्य के साथ समुदाय में बनाए जाने वाला सुरमा (काजल) और अन्य तैयार कर रहे हैं, जिसे दर्शक 3 सितंबर के बाद 'चिन्हारी' सोविनियर शॉप से खरीद भी सकेंगे। अब बेटे और पोते को बता रहे कला: राजस्थान के जिला डूंगरपुर से आए जोरा नाथ कचरू ने बताया कि वे 70 साल के हैं और उनके यहां परंपराओं से सुरमा (काजल) बनाया जा रहा है। काजल तैयार होने के एक दिन बाद उस काजल का इस्तेमाल किया जाता है। यह पारंपरिक सुरमा बनाने की तकनीक उन्होंने अपने दादा और पिता से सीखी है। साथ ही अब यह कला अपने बेटे और पोते को भी बताई है।

अपनी दादी, नानी और सास से सीखी कला

शिविर में राजस्थान कानपुरा से आईं गुड्डन बाई ने बताया कि उनके यहां वर्षों से भी ज्यादा समय से गुदड़ी बनाने की परंपरा है। उन्होंने यह परंपरा अपनी दादी, नानी और सास से सीखी है। इस गुदड़ी की कालबेलिया समुदाय में बहुत मान्यता है। जिसमें बेटी की शादी की विदाई के समय यह गुदड़ी उसे दी जाती है जो परंपराओं से चली आ रही है। पहले तो कपड़े के छोटे टुकड़े से गुदड़ी तैयार होती थी लेकिन अब बड़े कपड़े मिलने लगे हैं तो बड़ी गुदड़ी तैयार करने लगे हैं।