जैसलमेर में राजपूत छतरियां मृतकों के प्रति लगाव का प्रतीक

 28 Aug 2021 01:11 AM

राजस्थान के जैसलमेर में निवासरत राजपूतों में छतरी निर्माण की परंपरा का निर्वाहन दृढ़ता से किया जाता रहा है। ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार छतरी निर्माण की प्रक्रिया 6 वीं शताब्दी के आस पास प्रारंभ हुई। यह जानकारी इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय द्वारा आनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला के तहत दी गई। ऐसी संरचनाओं के निर्माण का उद्देश्य मृतकों की यादों को संजोना तथा उनकी स्मृतियों को अमरत्व प्रदान करना था। ये छतरियां मृत आत्माओं के प्रति लगाव एवं संतान की कर्तव्य परायणता एवं निष्ठा का प्रमाण देती हैं तथा भावी पीढ़ी को मृतक की स्मृतियों को जीवंतता प्रदान करने की परम्परा का निर्वाहन करती है। ये अलंकृत छतरियां समृद्धि की प्रतीक हैं। ये लोगों को गर्मी के समय में विश्राम, ताजी हवा और शीतलता प्रदान करती हैं।

कौशल व सुंदरता की मिसाल.... : इस छतरी के निर्माण हेतु निर्माण सामग्री जैसलमेर से ट्रक में परिवहन कर यहां लाई गई और साथ में वही से छतरी निर्माण तीर में सिद्धहस्त कलाकार भी आए थे। इन कलाकारों ने छतरी के विभिन्न भागों को यहां पर तराशा और छतरी के निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ की। अष्टकोणीय गुम्बदनुमा कलश आठ गोल नक्काशीदार खंभों पर स्थित है। गुंबद के केंद्रीय भाग में कमल की आकृति उकेरी गई है जो कलश और उसके आठ भागों को एक दूसरे से जोड़ती है, यह शिखर का हिस्सा है। गुंबद के आंतरिक भाग में नक्काशी की गई है एवं बाहरी हिस्सा गोलाकार है। यह राजपूतों के वास्तु कौशल एवं सुंदरता की मिसाल है।