साहित्य में विशेषज्ञता की चर्चा जरूरी

 31 Aug 2021 01:50 AM

किसी भी साहित्य का लेखक ही उस विषय का विशेषज्ञ होता है और समालोचना का कार्य भी वह स्वयं अधिक कुशलता के साथ कर सकता है। यदि व्यंग्यकार स्वयं ही व्यंग्य रचनाओं की समालोचना करे तो वह उस विषय पर न्याय पूर्ण तरीके से प्रस्तुत होती है । विशेषज्ञ होने की क्षमता ईश्वर ने सभी को प्रदान नहीं की है, इसलिए साहित्य में विशेषज्ञता पर चर्चा होना जरूरी है। यह कहना था, साहित्य अकादमी के निदेशक विकास दवे का। यह विचार उन्होंने साहित्यिक संस्था 'क्षितिज' के द्वारा आयोजित अश्विनी कुमार दुबे के व्यंग्य संग्रह 'इधर होना एक महापुरुष' पर चर्चा संगोष्ठी में व्यक्त किए। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार सूर्यकांत नागर ने कहा कि 'लेखन का उद्देश्य समाज कल्याण के लिए लिखना होता है और उसमें करुणा का स्वर आना जरूरी होता है। यदि कोई लेखक अपने लेखन में समाज की बात करता है तो यह उसका श्रेष्ठ प्रतिमान होता है। लेखक किस तरह सोचता है, किस तरह प्रयोग करता है और किस तरह लिखता है, यह किसी भी विधा के लेखन में बड़ा महत्वपूर्ण होता है और जब वह समाज से जुड़कर लिखता है तो उसका लेखन महत्वपूर्ण हो जाता है।