जिसकी सांसों में रंगकर्म हमेशा धड़कता रहता था

जिसकी सांसों में रंगकर्म हमेशा धड़कता रहता था

भोपाल ।  19 मई 1938 को महाराष्ट्र के माथेरान में जन्मा संघर्षशील, अनुशासित, मिलनसार, लेखक, नाट्य लेखक और निर्देशक.. जिसकी सांसों में रंगकर्म धड़कता और संवादों में साहित्य व रंगभाषा की महक थी। वह महज एक नाम नहीं, समकालीन हिंदुस्तानी, कर्नाटक रंगकर्म की जीती जागती परिभाषा था। रंगमंच में अनुभवों का विराट संसार समेटे, रंग-आंदोलन की अलख जगाते 81 वर्षीय वरिष्ठ रंगकर्मी गिरीश कर्नाड सोमवार को रंगमंच से पर्दा गिरा गए। गिरीश जी अब हमारे बीच नहीं हैं। गिरीश कर्नाड का भोपाल से गहरा रिश्ता रहा है। यहां भारत भवन में उनके नाटकों का मंचन होता रहा है। सन् 1998 में जब दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री थे और अजय सिंह संस्कृति मंत्री, तब गिरीश कर्नाड को मध्यप्रदेश संस्कृति विभाग ने ने कालिदास सम्मान से विभूषित किया था। बव कारंत गिरीश कर्नाड के अच्छ मित्र भी रहे बव कारंत ने रंगमंडल में जहां गिरीश कनार्ड के लिखे नाटक ह्यवदन, तुगलक नाटक खेला था। साथ ही नीलम मानसिंह चौधरी ने गिरीश कनार्ड के लिखे नाटक नागमंडल का मंचन किया था। 1998 में ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले गिरीश कर्नाड पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित हो चुके हैं। गिरीश ने 1970 में कन्नड़ फिल्म संस्कार से अपना फिल्मी सफर शुरू किया। उनकी पहली फिल्म को ही कन्नड़ सिनेमा के लिए राष्टÑपति का गोल्डन लोटस पुरस्कार मिला। आर के नारायण की किताब पर आधारित टीवी सीरियल मालगुड़ी डेज़ में उन्होंने स्वामी के पिता की भूमिका निभाई थी। 1990 की शुरुआत में विज्ञान पर आधारित एक टीवी कार्यक्रम टर्निंग पॉइंट में उन्होंने होस्ट की भूमिका निभाई। उनकी आखिरी फिल्म कन्नड़ भाषा में बनी अपना देश थी। बॉलीवुड की उनकी आखिरी फ़िल्म टाइगर जिÞंदा है (2017) में डॉ. शेनॉय का किरदार निभाया था। गिरीश कर्नाड की कन्नड़ और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में उनकी समान पकड़ थी। उन्होंने अपना फिल्मों में 1980 में गोधुली के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ पटकथा के फिल्मफेयर पुरस्कार से बव कारंत के साथ साझा रूप से नवाजा गया और नाटककार के तौर पर जाना जाता था। गिरीश यूनिवर्सिटी आॅफ शिकागो में प्रोफेसर भी रहे। कालिंदी संस्था का कार्यक्षेत्र भोपाल और कर्नाटक है। यह संस्था गिरीश कनार्ड के नाटकों का मंचन करती रहती है। गिरीश की इच्छा थी कि भोपाल में संस्था के किसी नाटक में शामिल हों। कुछ साल पहले वह भोपाल आने वाले थे, लेकिन नहीं आ पाए।