बेटे के जले पैर की दवाई के लिए तेज धूप में गांव से घंटों पैदल चली महिला

बेटे के जले पैर की दवाई के लिए तेज धूप में गांव से घंटों पैदल चली महिला

भोपाल । भैया बच्चा तीन दिन से दर्द से कराह रहा था, हमारे गांव के डॉक्टर फ्री में किसी को नहीं देखते। इसकी तकलीफ बढ़ती ही जा रही थी, यह कराहने लगा तो मेरा दिल बैठने लगा। इसलिए मैं इस नन्हीं जान को लेकर पैदल ही निकल पड़ी। मुझे किसी ने बताया था कि सूखी सेवनियां गांव के थोड़ा आगे कुछ लोग वहां से गुजरने वालों को दवा एवं खाना दे रहे हैं। मुझे लगा कि वहां शायद दवा मिल पाएगी। यह कहना है एक चंद्रा बाई का, जो अपने नन्हे बच्चे को दवा दिलाने चिलचिलाती धूप में करीब 16 किमी पैदल चलकर बालमपुर गांव से सूखी सेवनियां पहुंची। हालांकि यहां भी बच्चे के जले पैर पर लगाने की कोई दवा नहीं मिली। यहां पर काम कर रहे युवाओं ने बताया कि रोजाना यहां करीब 50 तक ग्रामीण इलाज कराने के लिए भोपाल की तरफ आ रहे हैं। उनका कहना है कि गांवों में किसी तरह का इलाज नहीं मिल रहा है।

आसपास के 50 गांवों से लंबा सफर करके आ रहे हैं दवा और इलाज के लिए

चंद्रा बाई के साथ उन्हीं के गांव से अनीता, जिनके पैर की हड्डी में चोट थी वह भी यहां दवा लेने  आई । अनीता ने बताया कि डॉक्टर फ्री में नहीं देखते हैं हम पहले पैसे देकर ही दिखाते थे मगर मजदूरी बंद होने के चलते अब पैसे नहीं है। हालांकि यहां कुछ संगठनों ने अनीता को दर्द की दवाइयां दीं। यहां सेवा कर रहे लोगों की मानें तो रोजाना 50 से अधिक गांव वाले दवाइयों की तलाश में आते हैं। लोगों को खाना बांटने वाले अब्दुल्ला, सचिन और अजय ने बताया कि हमारे पास सिर्फ जनरल चोट आदि की दवाइयां हैं जो दे देते हैं और लोगों को अस्पताल जाने में मदद करते हैं।

इन गांवों से आ रहे लोग दवा लेने

यहां प्रवासियों को खाना मुहैया कराने वाले युवाओं ने बताया कि रोजाना 50 से अधिक लोग दवा लेने आते हैं। गांव वाले बताते हैं कि दवा या डॉक्टर नहीं मिल रहे हैं इसलिए वह दवा या डाक्टर की तलाश में भटकते हुए यहां तक आ रहे हैं। इसमें सूखी सेवानिया, छोटा भदभदा, बालमपुर और दीवानगंज से पहले पड़ने वाले कुछ गांव वाले रोजाना दर्द की दवा या फिर चोट आदि की पट्टी करवाने आते हैं। गांव वालों का कहना है कि उनके गांवों के डॉक्टर बिना पैसे लिए इलाज नहीं करते, जबकि लॉकडाउन के कारण उनका कामकाज पूरी तरह ठप हो गया है।