नियमों और मापदंडों के पेंच से नर्सों का हो रहा ‘कॅरियर ब्रेक’

नियमों और मापदंडों के पेंच से नर्सों का हो रहा ‘कॅरियर ब्रेक’

भोपाल। ‘मैं पिछले छह साल से एक सरकारी मेडिकल कॉलेज में नर्स थी। मेरी मां की बीमारी के चलते मुझे सुविधानुसार दूसरे सरकारी मेडिकल कॉलेज में ट्रांसफर लेना पड़ा, लेकिन क्या पता था कि मेरी परेशानियां और बढ़ जाएंगी। मेरा सपना तब टूट गया, जब बताया गया कि मेडिकल कॉलेज की अदला-बदली से मेरी छह साल की सीनियरिटी खत्म हो जाएगी। इसके नतीजे में अब आगे कोई प्रमोशन भी नहीं मिलेगा। यहां तक कि एक से दूसरे संस्थान में जाना नई नियुक्ति मानी जाएगी। इससे तो हमारा कॅरियर चौपट हो जाएगा। सरकार के नियम और मापदंड हमारे भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं। हम सरकारी नौकरी में इसलिए आए कि हमें प्रमोशन मिलेगा, वेतनमान बढ़ेगा। अगर न्याय नहीं मिला और यही रवैया रहा तो नर्सिंग सेक्टर में क्यों जाएं?’ यह पीड़ा किसी एक नर्स की नहीं, बल्कि मेडिकल कॉलेजों में पदस्थ तमाम कर्मचारियों की है। भाजपा शासनकाल में 30 सितम्बर 2018 को चिकित्सा शिक्षा विभाग द्वारा जारी एक आदेश ने सैकड़ों की संख्या में कार्यरत मेडिकल कॉलेज की नर्सों और कर्मचारियों का कॅरियर ब्रेक कर दिया है। विभाग ने गैरशैक्षिक आदर्श सेवा नियम 2018 के नियम 10 अ का हवाला देते हुए गाइड लाइन जारी की है। इसमें बताया गया कि एक मेडिकल कॉलेज से दूसरे मेडिकल कॉलेज में अदला-बदली की तो कर्मचारी की नई नियुक्ति मानी जाएगी। शासन ने यह भी तर्क दिया है कि मेडिकल कॉलेज स्वशासी संस्थाएं हैं, इसलिए अपने नियमों का पालन करने स्वतंत्र हैं।

इन शर्तों से चौपट हो रहा भविष्य

* परस्पर अदला-बदली के लिए प्रस्तुत आवेदन पत्र को ही पूर्व संस्था से त्यागपत्र माना जाएगा। एक संस्थान से दूसरे संस्थान पर हुई नियुक्ति कार्यभार ग्रहण करने की तारीख से नवीन नियुक्ति मानी जाएगी।

* पिछले कॉलेज में की गई सेवा के वेतन पर चयनित व्यक्ति का वेतन निर्धारित किया जाएगा।

* नियुक्त कर्मचारी को संस्थान अदला-बदली करने से कार्यभार ग्रहण करने के पहले मेडिकल बोर्ड के सामने अपने खर्च पर स्वास्थ्य परीक्षण कराना होगा, परीक्षण संबंधी उपयुक्तता प्रमाण पत्र देना होगा।

* सात दिन में कार्यभार ग्रहण नहीं किया तो नियुक्ति आदेश निरस्त होगा।

* नए कॉलेज में जाने पर पेंशन की पात्रता नहीं होगी, लेकिन एनपीएस की सुविधा मिलेगी।

हर कॉलेज में डेढ़ सौ से ज्यादा नर्सें

प्रदेश के हर मेडिकल कॉलेज में डेढ़ सौ से अधिक नर्सें और इतने ही अन्य कर्मचारी हैं। एक कर्मचारी ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा कि हम इस उम्मीद से मेडिकल कॉलेज में नौकरी करने आए कि अच्छा वेतनमान मिलेगा और प्रमोशन भी। इससे अच्छा है कि किसी प्राइवेट अस्पताल में जाकर नौकरी करें।

नई नियुक्ति से क्या है नुकसान

* दस साल की नौकरी होने पर समयमान वेतनमान मिलता है, जो नहीं मिलेगा।

* पांच साल की सेवा पूरी होने पर बीएससी नर्सिंग से एमएससी या पीएचडी करने के लिए सरकार द्वारा दिए जाने वाले दो साल का अध्ययन अवकाश से वंचित।

* स्वशासी मेडिकल कॉलेजों में नर्सों को चाइल्ड लीव भी नहीं मिलती।