लंका तो भस्म हो गई, लेकिन रावण आज भी जिंदा हैं : शास्त्री

लंका तो भस्म हो गई, लेकिन रावण आज भी जिंदा हैं : शास्त्री

इंदौर । मानस की कथा मनुष्य को निर्भयता प्रदान करती है। महापुरुष वही होते हैं, जो स्वयं की समस्या को छोड़कर राष्टÑ की समस्याओं के निवारण का चिंतन करते हैं। राम ने लंका को अपना साम्राज्य बढ़ाने के लिए नहीं जीता, बल्कि जीती हुई लंका भी विभीषण को सौंप दी। दुनिया के सारे विवादों का जन्म लक्ष्मण रेखा के उल्लंघन से ही होता है। भारतीय समाज मर्यादाओं की लक्ष्मण रेखा पर टिका हुआ है। रावण की सोने की लंका तो भस्म हो गई, लेकिन अपने आसपास की लंकाएं और उनके राजा रावण आज भी जिंदा हैं। रावण और कंस समाज की प्रवृत्ति बन गए हैं। इनके नाश के लिए एक बार फिर प्रभु राम को अवतरण लेना होगा। सनातन धर्म की रक्षा के लिए जब तक हमारा समाज संगठित नहीं होगा, ऐसे रावण सिर उठाते रहेंगे। समाज तभी समृद्ध और संगठित होगा, जब हनुमान जैसे सेवक और राम जैसे शासक सामने आएंगे। ये विचार हैं आचार्य पं. नारायण शास्त्री के, जो उन्होंने विमानतल मार्ग स्थित सुखदेव नगर के पंचवटी हनुमान मंदिर, सुखदेव वाटिका पर चल रही संगीतमय श्रीराम कथा में रामेश्वर स्थापना एवं लंका दहन प्रसंगों की व्याख्या करते हुए व्यक्त किए। इस अवसर पर भक्तों ने फाग महोत्सव भी मनाया। फूलों एवं प्राकृतिक रंग-गुलाल एवं अबीर से फाग खेलकर एक-दूसरे को शुभकामनाएं दी गईं। प्रारंभ में विधायक एवं महापौर श्रीमती मालिनी गौड़, संजय शुक्ला, आकाश विजयवर्गीय आदि ने व्यासपीठ का पूजन किया। आचार्य पं. शास्त्री ने कहा कि सीखने के लिए श्रद्धा चाहिए। जीवन में आस्था, श्रद्धा और विश्वास का निवेश करना भी सीखना चाहिए। सीमा रेखा केवल भक्तों के लिए ही नहीं, भगवान के लिए भी है। लंका जीतने के लिए भगवान ने रामेश्वरम में ज्योतिर्लिंग की स्थापना की। हम सबको जीवन में एक लक्ष्मण रेखा भी खींचना चाहिए जो हमें मर्यादित बनाएगी। हनुमानजी ने लंका जलाई, लेकिन अशोक वाटिका और विभीषण के घर आग नहीं पहुंची। राम की शरण में आए भक्तों का कुछ नहीं बिगड़ता। इस देश का पराक्रम ही था कि बंदर-भालू ने ही सेतु तैयार कर लिया।