अगर उर्दू लेखक को सही मंच मिल जाए तो फिक्शन के दौर में क्रांति भी ला सकते हैं : नईम कौसर

अगर उर्दू लेखक को सही मंच मिल जाए तो फिक्शन के दौर में क्रांति भी ला सकते हैं : नईम कौसर

भोपाल ।  मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी संस्कृति विभाग के तत्वावधान में रविवार को 'अफसाने का अफसाना' कार्यक्रम का आयोजन हुआ। स्वराज भवन में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता नईम कौसर ने की। इसमें देश के प्रख्यात कहानीकारों ने शिरकत की। कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी की सचिव डॉ. नुसरत मेहदी ने अपने उद्बोधन में कहा कि उर्दू अकादमी निरंतर साहित्य की हर विधा पर कार्यक्रम आयोजित कर रही है उसी श्रृंखला में यह कार्यक्रम ‘अफसाने का अफसाना ’ आयोजित किया गया है।

इन्होंने सुनाए अफसाने

इस अवसर पर कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे नईम कौसर ने कहा कि उर्दू अफसानों ने कई दौर देखे और यह दौर इस फिक्शन के क्षेत्र में क्रांति ला सकता है यदि नए लिखने वालों को सही समय पर सही मंच मिल जाए। वहीं लखनऊ से आए फैयाज रफअत ने अपना अफसाना 'नगमा-एआशो ब' सुनाते हुए कहा 'रात और दिन की सरहदें नहीं थीं, कुछ नहीं था बस एक जाते वाहिद सिर्फ एक जात अपने आप में जिन्दा थी और सांस ले रही थी। इस जात के अलावा न कभी कुछ था न अब कुछ है यह जाते वाहिद सब कुछ है।' इसी क्रम में दिल्ली के सलमान अब्दुस्समद ने अपनी कहानी 'नया वजूदा' में किसान के मामले को पेश किया। उन्होंने लिखा कि प्रेमचंद के जमाने में किसानों की जो हालत थी वही हालात आज भी हैं। वहीं मेरठ के असलम जमशेदपुरी ने अपना अफसाना 'आधी अधूरी कहानी' में भारत के वर्तमान समाज में आने वाले परिवर्तन को शब्दों में ढाला है। यह कहानी छोटी-छोटी घटनाओं को एक माला में पिरोती हुई हमारे सामने एक ऐसा दृश्य पेश करती है जो एक बड़ा सच है। शिफाली पांडे (भोपाल) ने अपने चार छोट-छोटे अफसाने सरहद का इश्क, कश नहीं कश, मेरे नाम का सच और अम्मा सुनाई। इकबाल मसूद ने अपनी कहानी 'बीरबहुटियां' सुनाते हुए कहा कि यह कहानी पठानों के बारे में है जो जंग से नफरत करते हैं ।