मैं फूलन देवी, बीहड़ में बची, दिल्ली में मारी गई.

मैं फूलन देवी, बीहड़ में बची, दिल्ली में मारी गई.

भोपाल  । ..अगरबत्ती नाटक का कथानक स्त्री विमर्श पर केंद्रित था। इस नाटक ने बेहमई कांड में हुए नरसंहार के बाद मारे गए लोगों की विधवाओं के जीवन के काल्पनिक संवादों के जरिए स्त्री के हक और प्रतिकार की दास्तान भावुक कर देने वाला मंचन शहीद भवन में किया गया। बेहमई कांड जिसमें फूलन देवी ने उन पुरुषों को मौत के घाट उतार दिया था, जिन्होंने उनके साथ अन्याय किया था। नाटक की शुरुआत उसी दृश्य से होती है। उन मारे गए पुरुषों के विधवाओं के रुदन और जीवन संघर्ष के बीच नाटककार आशीष पाठक ने कुछ काल्पनिक दृश्य और संवादों के जरिए विधवाओं को फूलन देवी के इस कृत्य पर उससे नफरत करते हुए और बाद में फूलन देवी के पक्ष में खड़े होते दिखाया। युवा निर्देशिका स्वाति दुबे ने अपनी बेहतरीन कल्पनाशीलता इस विषय को गति दी। देश के सबसे बड़े कारपोरेट पुरस्कार मेटा एक्सीलेंस अवार्ड से इस नाटक को सम्मानित किया जा चुका है। राष्टय नाट्य विद्यालय नई दिल्ली की स्नातक स्वाति के मुताबिक रंगकर्म ने उनके भीतर के कोलाहल को शांत किया तो भी मल्टीनेशनल की जॉब छोड़कर थिएटर की राह ली। नाटक में संवाद मैं फूलन देवी, बीहड़ में बची, दिल्ली में मारी गई, पापी नातेदार हैं तो भी पापी हैं, ठाकरन को मारो है ठकरास नहीं मरी .. जैसे संवादों का उपयोग किया गया।

मारे गए सभी पुरुष नहीं थे, कुछ ही पुरुष थे

बेहमई हत्याकांड में मारे गए ठाकुरों की विधवाओं के पुनर्वास के लिए सरकार ने अगरबत्ती का एक कारखाना खुलवाया। जेल में बंद चंबल की रानी को खत्म किए बिना पति की अस्थिभस्म का तर्पण न करने को संकल्पित लालाराम ठकुराइन कल्ली की मदद के इंतजार में सभी को संगठित कर रही है। यहां दमयंती एक बहस को जन्म देती है कि मारे गए सभी पुरुष नहीं थे, कुछ ही पुरुष थे। अगरबत्ती में बेहमई की अस्थिभस्म मिल जाती है क्योंकि महिलाओं को फूलन के साथ हुए अन्याय का दर्द महसूस होता है।