गांधीजी के विचारों की जरूरत देश के साथ विश्व को भी : कमल नाथ

गांधीजी के विचारों की जरूरत देश के साथ विश्व को भी : कमल नाथ

तकनीक के इस युग में बिना ज्यादा तकनीक की मदद लिए सप्रे संग्रहालय ने जिस तरह से इतिहास को संजोया है वह अपने आप में अनूठा है,अपने इसी कार्य की बदौलत इस संग्रहालय ने विश्व में अपनी अलग पहचान बनाई है। यह कहना था मुख्यमंत्री कमलनाथ का जो गुरुवार को सप्रे संग्रहालय में 'कर्मवीर के सौ साल' समापन समारोह में बतौर मुख्य अतिथि मौजूद थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुरेश पचौरी ने की और विशेष अतिथि के रूप में जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा उपस्थित थे। दो चरणों में संपन्न इस कार्यक्रम के दूसरे चरण में 'गांधी के सरोकार और पत्रकारिता' विषय पर संगोष्ठी हुई। इस दौरान विभिन्न विद्वानों ने अपने विचार रखे। इस अवसर पर कर्मवीर के सौ साल संदर्भ ग्रन्थ का लोकार्पण भी किया गया। मुख्यमंत्री कमल नाथ ने आगे कहा कि इस संग्रहालय के बारे में पहले भी बहुत कुछ सुन रखा था लेकिन आज आ पाया हूं। उन्होंने कहा कि यह भी एक संयोग ही है कि आज बापू और माखनलाल चतुर्वेदी की पुण्यतिथि तो है ही साथ ही कर्मवीर के सौ साल समारोह भी है। इस ऐतिहासिक दिवस पर मुझे संग्रहालय में आने का अवसर मिला। यहां आकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं। उन्होंने कहा कि आज गांधी के विचारों की जरूरत देश को तो है ही विश्व को भी है। विश्व इसे समझ रहा है भले ही इस देश में उन्हें भुलाने की कोशिशें हो रही हैं, जो ऐसा होना नहीं चाहिए । 'कर्मवीर' हमारे बीच हमेशा रहेगा उन्होंने अफ्रीका के एक देश का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां के राष्ट्रपति अपने कक्ष में अंबेडकर और बापू की तस्वीर लगाते हैं। उनका कहना है कि इन दोनों ने ही हमें जो दिशा दी उस पर हमारा देश तरक्की कर रहा है। अंबेडकर से प्रेरित होकर उन्होंने अपने देश का संविधान बनया और बापू के अहिंसा के मार्ग पर चल कर देश में शांति स्थापित हुई। वहीं मुख्यमंत्री ने माखनलाल जी को याद करते हुए कहा कि कर्मवीर जैसे पत्र का संपादन किया। आज भले ही माखनलाल जी नहीं हैं पर 'कर्मवीर' हमारे बीच हमेशा रहेगा। संग्रहालय में पांच करोड़ पन्ने संरक्षित कार्यक्रम की शुरूआत में संग्रहालय के संस्थापक निदेशक विजयदत्त श्रीधर ने बताया कि संग्रहालय जैसे दूसरा कोई संग्रहालय विश्व में नहीं है। यहां पांच करोड़ पन्ने संरक्षित हैं। यहां उपलब्ध सामग्री का लाभ उठाकर 1167 स्टूडेंट्स ने डी .लिट और 1165 स्टूडेंट्स ने शोध कार्य किए हैं।

सत्य आधारित थी गांधी की पत्रकारिता

दूसरे चरण में 'गांधी के सरोकार और पत्रकारिता' विषय पर डॉ. रामाश्रयप्र रत्नेश की अध्यक्षता में संगोष्ठी हुई। संगोष्ठी में करीब डेढ़ दर्जन वक्ताओं ने भागीदारी की। सभी का एकअमत से मानना था कि गांधी की पत्रकारिता के समय स्थितियां अलग थी। उन्होंने अपने प्रकाशनों के जरिए आजादी के आंदोलन के जनता को तैयार किया। गांधी की पत्रकारिता जहां सत्य पर आधारित थी वहीं आज की पत्रकारिता में इसका अभाव है। सभी का मानना था कि गांधी के सिद्धांतों के अनुरूप किस तरह पत्रकारिता हो इस पर विचार किया जाना चाहिए।