पंचकुइया मुक्तिधाम में चार साल से बंद है इलेक्ट्रिक शवदाह गृह

  पंचकुइया मुक्तिधाम में चार साल से बंद है इलेक्ट्रिक शवदाह गृह

  पंचकुइया मुक्तिधाम में चार साल से बंद है इलेक्ट्रिक शवदाह गृह

संक्रमण का बढ़ा खतरा : खुले में जला रहे कोरोना मृतकों के शव, सुरक्षा को लेकर प्रशासन अभी गंभीर नहीं

कोरोना से होने वाली मौतों के बाद उनके शवों का अंतिम संस्कार पंचकुइया मुक्तिधाम के इलेक्ट्रिक शवदाह गृह में करने के बजाय उन्हें खुले में जलाया जा रहा है। मजबूरी यह है कि यहां बना इलेक्ट्रिक शवदाह गृह चार साल से बंद है। इसे इलेक्ट्रिक के बजाय अब एलपीजी से जोड़ा जा रहा है। बंद के बाद से कई बार कलेक्टर और नगर निगम कमिश्नर को भी जानकारी दी गई। यहां तक कि शहर की जनता की सुरक्षा को देखते हुए इलेक्ट्रिक शवदाह गृह में शव का अंतिम संस्कार करने की बात भी की जा रही है। इसके बावजूद इसको लेकर प्रशासन अब तक कोई कदम नहीं उठा रहा है। मंगलवार को भी खजूरी बाजार के कोरोना से मृत एक व्यक्ति का अंतिम संस्कार खुले में ही किया गया।  डॉक्टरों के अनुसार कोरोना पीड़ित मरीजों के मेडिकल वेस्ट को 1100 डिग्री सेल्सियस पर जलाए जाने के निर्देश हैं, लेकिन कोरोना से होने वाली मौत के बाद शव का अंतिम संस्कार लकड़ी-कंडों से किया जा रहा है। कोरोना के कारण मृतक के परिजन भी इस संस्कार में शामिल नहीं होते। मुक्तिधाम पर जनसेवकों के माध्यम से ही अंतिम संस्कार किया जाता है। ऐसे में इन लोगों को भी कोरोना संक्रमण का खतरा है। साथ ही पंचकुइया मुक्तिधाम के पास रहने वाले लोग भी इस संक्रमण के शिकार हो सकते हैं। 
300 से अधिक शव हर महीने आते हैं यहां
पंचकुइया मुक्तिधाम में रोजाना 9-10 और अधिकतम 13 शव अंतिम संस्कार के लिए आते हैं। वहीं महीने में इनकी संख्या 300 से 325 तक पहुंच जाती है। स्थित अब भी वही है लेकिन कोरोना संक्रमण के कारण खतरा बढ़ गया है। ऐसे में यह पहचानना मुश्किल है कि कोरोना से मरने वाला व्यक्ति कौन है। जो लोग अस्पताल से सीधे आते हैं, उन्हें अस्पताल प्रबंधन पूरी सुरक्षा के साथ भेजता है, लेकिन जिनकी मौत का कारण पता ही नहीं है या मौत के बाद में रिपोर्ट आती है, उनका अंतिम संस्कार तो सामान्य रूप से होता है। इसमें उसने रिश्तेदार व अन्य परिजन भी शामिल होते हैं। 
मप्र में सबसे पहले बना था इलेक्ट्रिक शवदाह गृह
पंचकुइया मोक्षधाम विकास समिति के संयोजक प्रेमनारायण बाहेती ने बताया कि मप्र में सबसे पहले इंदौर में 1981 में इलेक्ट्रिक शवदाह गृह बनाया गया था। कुछ दिन तक यह चला और बंद हो गया। 1990 में इसे सही कराया गया। इसका खर्च बहुत ज्यादा था। 1000 डिग्री सेल्सियस तक लाने के लिए इसे तीन घंटे पहले चालू करना पड़ता था। वहीं इसमें लगने वाली रॉड यदि खराब हो जाती थी, तो उसका खर्च भी 1500 रुपए से अधिक आता था। उस समय शव को जलाना नि:शुल्क था। इसलिए इसे बंद कर दिया गया। पहले इसे सीएनजी किया जा रहा था, लेकिन अब एलपीजी के लिए लाइन डाली जा रही है। 
रजिस्टर पर नहीं लिख रहे मौत का कारण
पंचकुइया मुक्तिधाम में लकड़ी से दाह संस्कार करने के लिए 2200 रुपए की रसीद कटती है। कंडे से दाह संस्कार कराने के लिए 3100 रुपए लगते हैं। यहां रजिस्टर में भी इंट्री की जाती है, जिससे कि लोगों को बाद में पता चल सके कि व्यक्ति की मौत का कारण क्या था, लेकिन कई लोग शव को लाने के बाद मौत का कारण केवल बीमारी ही लिखवाते हैं।