चंद्रयान-2 : साइकिल से चांद तक का सफर

चंद्रयान-2 : साइकिल से चांद तक का सफर
चंद्रयान-2

नई दिल्ली। जब यह अखबार आपके हाथ में होगा तो चंद्रयान-2 चांद पर कदम रख चुका होगा। 22 जुलाई को दिन के 2:43 बजे इसरो ने मिशन चंद्रयान-2 के सफलतापूर्वक लॉन्च के जरिये इतिहास रचा था। शुक्रवार की रात चंद्रयान-2 चांद के दक्षिणी हिस्से पर लैंड करने से चंद कदम दूर था। यहां आज तक किसी ने लैंडिंग नहीं की है। चंद्रयान-2 सफल रहने के बाद भारत सॉμट लैंडिंग कराने वाला चौथा देश होगा। अब तक रूस, अमेरिका और चीन ही सॉμट लैंडिंग करवा पाए है। इस कदम तक पहुंचने के लिए इसरो ने साइकिल से सफर की शुरुआत की थी। 

इसरो की स्थापना इसरो की स्थापना

15 अगस्त 1969 को डॉ.विक्रम साराभाई ने की थी। मकसद अंतरिक्ष शोध के क्षेत्र में काम करना था। एसएलवी-3 भारत का पहला स्वदेशी सैटलाइट लॉन्च व्हीकल था। एपीजे अब्दुल कलाम परियोजना के निदेशक थे। उन्होंने अपनी किताब ‘द विंग्स आॅफ फायर में इसका जिक्र किया है। 

1963 में साइकिल से ले जाया गया था पहला रॉकेट उस वक्त इसरो नहीं बल्कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति काम करती थी। 

कलाम ने कंधों पर उठाया था रॉकेट

21 नवंबर 1963 को भारत का ‘नाइकअ पाची’ नाम का पहला रॉकेट छोड़ा गया। यह गुंजायमान रॉकेट (साउंडिंग रॉकेट) नासा में ही बना था। यह रॉक्ेट एक चर्च की इमारत में जोड़ा गया था। इसे ले जाने के लिए उपकरण के नाम पर सिर्फ एक ट्रक और हाथ से चलाने वाली हाइड्रोलिक क्रेन थी। जोडकर तैयार किए गए इस पूर्ण रॉकेट को चर्च से प्रक्षेपण स्थल तक ट्रक से ले जाया गया था। जब रॉकेट को क्रेन से उठाया गया और लॉन्चर पर रखा जाने लगा, तभी इसमें झुकाव आना शुरू हो गया। क्रेन की हाइड्रोलिक प्रणाली में रिसाव आने से यह गड़बड़ी पैदा हो रही थी। रॉकेट छोड़े जाने का समय शाम छह बजे का था, जो तेजी से नजदीक आता जा रहा था। क्रेन मूें अब किसी भी हालत में मरम्मत हो नहीं सकती थी। तब रॉकेट को हम लोगों ने ही हाथों और कंधों पर उठा लिया और लॉचर पर स्थापित कर दिया। - डॉ. कलाम की किताब द विंग्स आॅफ फायर से 

बैलगाड़ी से गया दूसरा रॉकेट

1981 में इसरो ने अपना दूसरा सैटेलाइट एपल लॉन्च किया था। इसे लॉन्च पैड एक बैलगाड़ी पर लाया गया था। इसके बाद धीरे-धीरे इसरो ने खुद को विकसित किया 

पहला चंद्रयान

चांद पर भेजे गए इसरो के पहले मिशन का नाम था चंद्रयान। 22 अक्टूबर, 2008 को चंद्रयान मिशन लॉन्च किया गया था। इस दौरान चांद पर पानी की खोज हुई। 2009 में नासा ने भी पुष्टि की थी। 

मिशन मार्स

भारत के वैज्ञानिकों ने मंगल मिशन के लिए अमेरिका से इंजिनियरिंग सहायता और विधियों के बारे में मदद मांगी तो अमेरिका ने इनकार कर दिया। 5 नवंबर, 2013 को मंगल मिशन शुरू किया। 

भविष्य की योजनाएं : गगनयान

भारत ने 2022 तक अपने मानवयुक्त मिशन को अंतरिक्ष में भेजने की योजना बनाई है। इस मिशन को गगनयान मिशन का नाम दिया गया है। इस मिशन के लिए अंतरिक्षयात्रियों को चुनने का पहले पड़ाव पार कर लिया गया है। 

फिर भी बजट नासा से आधा

पिछले 40 सालों में इसरो का खर्च नासा के एक साल के बजट के आधे से भी कम रहा। चंद्रमा पर इसरो के पहले मिशन चंद्रयान प्रथम पर करीब 390 करोड़ रुपए खर्च हुए, जो नासा द्वारा इसी तरह के मिशन पर होने वाले खर्च के मुकाबले 8-9 गुना कम है।